सोमवार व्रत विधि व कथा। Somvar vrat vidhi aur katha.

हर हर महादेव !!! आज के ब्लॉग में हम आपको बताने वाले है कि साधारण प्रति सोमवार की पूजन विधि और कथा के बारे में।

सोमवार का व्रत साधारणतया दिन के तीसरे पहर तक होता है। व्रत में फलाहार या पारण का कोई खास नियम नहीं है। किंतु यह आवश्यक है कि दिन-रात में केवल एक समय भोजन करें। सोमवार के व्रत में शिव जी एवं पार्वती का पूजन करना चाहिए। सोमवार के व्रत तीन प्रकार के हैं:- साधारण प्रति सोमवार, सोम में प्रदोष और सोलह सोमवार। विधि तीनों की एक जैसी है। शिव पूजन के पश्चात कथा सुननी चाहिए। प्रदोष व्रत, सोलह सोमवार, प्रति सोमवार इन तीनों की कथा अलग-अलग है। आज हम साधारण प्रति सोमवार की व्रत कथा जानेंगे।

कथा:- एक बहुत धनवान साहूकार था, जिसके घर में धन आदि किसी प्रकार की कमी नहीं थी। परंतु उसको एक दुख था कि उसके कोई पुत्र नहीं था। वह इसी चिंता में दिन-रात रहता था। वह पुत्र की कामना के लिए प्रति सोमवार को शिवजी का व्रत और पूजन किया करता था तथा सायंकाल को शिव मंदिर में जाकर शिव जी के श्री विग्रह के सामने दीपक जलाया करता था। उसके इस भक्तिभाव को देखकर एक समय श्री पार्वती जी ने शिवजी महाराज से कहा कि – महाराज! यह साहूकार आपका अनन्य भक्त और सदैव आपका व्रत और पूजन बड़ी श्रद्धा से करता है। इसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिए।

यह भी पढ़े :- golden tips to improve your focus

शिवजी ने कहा – हे पार्वती! यह संसार कर्मक्षेत्र है। जैसे किसान खेत में जैसा बीज होता है वैसा ही फल काटता है। उसी तरह इस संसार में प्राणी जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल भोंगते हैं। पार्वती जी ने अत्यंत आग्रह से कहा – महाराज! जब यह आपका अनन्य भक्त और इसको अगर किसी प्रकार का दु:ख है तो उसको अवश्य दूर करना चाहिए। क्योंकि आप सदैव अपने भक्तों पर दयालु रहते हैं और उनके दुखों को दूर करते हैं। यदि आप ऐसा नहीं करोगे तो मनुष्य आपकी सेवा तथा व्रत क्यों करेंगे?

पार्वती जी का ऐसा आग्रह देख शिवजी महाराज कहने लगे – हे पार्वती! इसके कोई पुत्र नहीं है। इसी चिंता में यह अति दु:खी रहता है। इसके भाग्य में पुत्र ना होने पर भी मैं इसको पुत्र की प्राप्ति का वर देता हूँ। परंतु यह पुत्र केवल 12 वर्ष तक जीवित रहेगा। इसके पश्चात वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। इससे अधिक मैं और कुछ इसके लिए नहीं कर सकता। यह सब बातें साहूकार सुन रहा था। इससे उसको ना कुछ प्रसन्नता हुई और ना ही कुछ दु:ख हुआ। मैं पहले जैसा ही शिवजी महाराज का व्रत और पूजन करता रहा।

यह भी पढ़े :- माँ के जन्मदिन पर क्या तोहफ़ा दे ?

कुछ साल व्यतीत हो जाने पर साहूकार की स्त्री गर्भवती हुई और दसवें महीने उसके गर्भ से अति सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। साहूकार के घर में बहुत खुशी मनाई गई। परंतु साहूकार ने उसकी केवल 12 वर्ष की आयु जान कोई अधिक प्रसन्नता प्रकट नहीं की और ना ही किसी को यह भेद ही बताया। जब वह बालक 11 वर्ष का हो गया तो उस बालक की माता ने उसके पिता से विवाह आदि के लिए कहा तो वह साहूकार कहने लगा कि – अभी मैं इसका विवाह नहीं करूंगा।

अपने पुत्र को काशी जी पढ़ने के लिए भेजूंगा। फिर साहूकार ने अपने साले अर्थात बालक के मामा को बुला उसको बहुत सा धन देकर कहा – तुम इस बालक को काशी जी पढ़ने के लिए ले जाओ और रास्ते में जिस स्थान पर भी जाओ यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते जाना।वह दोनों मामा-भांजे यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते जा रहे थे। रास्ते में एक शहर पड़ा। उस शहर में राजा की कन्या का विवाह था और दूसरे राजा का लड़का जो विवाह कराने के लिए बरात लेकर आया था वह एक आंख से काना था।

उसके पिता को इस बात की बड़ी चिंता थी कि कहीं वर को देख कन्या के माता-पिता विवाह में किसी प्रकार की अड़चन पैदा बना कर दें। इस कारण जब उसने अति सुंदर सेठ के लड़के को देखा तो उसके मन में विचार आया कि क्यों न दरवाजे के समय इस लड़के से वर का काम चलाया जाए। ऐसा विचार कर वर के पिता ने उस लड़के और मामा से बात की तो वे राजी हो गए। फिर उस लड़के को वर के कपड़े पहना तथा घोड़ी पर चढ़ा दरवाजे पर ले गए और सब कार्य प्रसंता से पूर्ण हो गया। फिर वर के पिता ने सोचा कि यदि विवाह भी इसी लड़के से करा लिया जाए तो क्या बुराई है

यह भी पढ़े :- gift for father पापा को क्या गिफ्ट दे ?

ऐसा विचार कर लड़के और उसके मामा से कहा – यदि आप फेरों का और कन्यादान के काम को भी करा दें तो आपकी बड़ी कृपा होगी। मैं इसके बदले में आपको बहुत कुछ धन दूंगा। तो उन्होंने स्वीकार कर लिया। विवाह कार्य भी बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया। परंतु जिस समय लड़का जाने लगा तो उसने राजकुमारी की चुंदड़ी के पल्ले पर लिख दिया कि तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ है परंतु जिस राजकुमार के साथ तुम को भेजेंगे वह एक आंख से काना है। मैं काशी जी पढ़ने जा रहा हूँ। लड़के के जाने के पश्चात राजकुमारी ने जब अपनी चुंदड़ी पर ऐसा लिखा हुआ पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया और कहा कि – यह मेरा पति नहीं है। मेरा विवाह इसके साथ नहीं हुआ है। वह तो काशी जी पढ़ने गया है।

राजकुमारी के माता-पिता ने अपनी कन्या को विदा नहीं किया और बारात वापस चली गई। उधर सेठ का लड़का और उसका मामा काशी जी पहुंच गए। वहां जाकर उन्होंने यज्ञ करना और लड़के ने पढ़ना शुरू कर दिया। जब लड़के की आयु 12 वर्ष की हो गई उस दिन उन्होंने यज्ञ रचा रखा था कि लड़के ने अपने मामा से कहा – मामा जी! आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मामा ने कहा – अंदर जाकर सो जाओ। लड़का अंदर जाकर सो गया और थोड़ी देर में उसके प्राण निकल गए। जब उसके मामा ने आकर देखा तो वह मुर्दा पड़ा था तो उसको बड़ा दु:ख हुआ उसने सोचा कि अगर मैं अभी रोना पीटना मचा दूंगा तो यज्ञ का कार्य अधूरा रह जाएगा। अतः उसने जल्दी से यज्ञ का कार्य समाप्त कर ब्राह्मणों के जाने के बाद रोना पीटना आरंभ कर दिया।

यह भी पढ़े :- भारत के रोचक तथ्य हिंदी में Facts about India in hindi

संयोगवश उसी समय शिव-पार्वती जी उधर से जा रहे थे। जब उन्होंने जोर-जोर से रोने की आवाज सुनी तो पार्वती जी कहने लगे – महाराज! कोई दुखिया रो रहा है। इसके कष्ट को दूर कीजिए। जब माता पार्वती ने पास जाकर देखा तो वहां एक लड़का मुर्दा पड़ा था। पार्वती जी कहने लगी – महाराज! यह तो उसी सेठ का लड़का है जो आप के वरदान से हुआ था।शिव जी कहने लगे – हे पार्वती! इसकी आयु इतनी थी सो यह भोग चुका। तब पार्वती जी ने कहा – हे महाराज! इस बालक को और आयु दो नहीं तो इसके माता-पिता तड़प-तड़पकर मर जाएंगे। पार्वती जी के बार-बार आग्रह करने पर शिवजी ने उसको जीवन वरदान दिया शिव जी महाराज की कृपा से लड़का जीवित हो गया। शिव पार्वती कैलाश चले गए।

वह लड़का और मामा उसी प्रकार यज्ञ करते तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते अपने घर की ओर चल पड़े। रास्ते में उसी शहर में आए जहाँ उसका विवाह हुआ था। वहां पर आकर उन्होंने यज्ञ आरंभ कर दिया तो उस लड़के के ससुर ने उसको पहचान लिया और अपने महल में ले जाकर उसकी बड़ी खातिर की। साथ ही बहुत से दास- दासियों सहित आदरपूर्वक लड़की और जमाई को विदा किया। जब वे अपने शहर के निकट आए तो मामा ने कहा – मैं पहले घर जाकर ख़बर कर आता हूँ। जब उस लड़के का मामा घर पहुँचा तो लड़के के माता-पिता घर की छत पर बैठे थे और यह प्रण कर रखा था कि यदि हमारा पुत्र सकुशल लौट आया तो हम राज़ी- खुशी नीचे आ जाएँगें नहीं तो छत से गिरकर अपने प्राण दे देंगे।

यह भी पढ़े :- Most Subscribed Individual Indian youtubers and their income In 2020

इतने में उस लड़के के मामा ने आकर यह समाचार दिया कि आपका पुत्र आ गया है तो उनको विश्वास नहीं आया। उसके मामा ने शपथपूर्वक कहा कि – आपका पुत्र अपनी स्री के साथ बहुत सारा धन लेकर आया है तो सेठ ने आंनद के साथ उसका स्वागत किया और बड़ी प्रसन्ता के साथ रहने लगे।

इसी प्रकार से जो कोई भी सोमवार के व्रत को धारण करता है अथवा इस कथा को पढ़ता और सुनता है उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

पढ़ने के लिए धन्यवाद 😊😊

2 thoughts on “सोमवार व्रत विधि व कथा। Somvar vrat vidhi aur katha.”

Leave a Reply

%d bloggers like this: